Showing posts with label त्रिवेणी. Show all posts
Showing posts with label त्रिवेणी. Show all posts

June 23, 2009

क्या करोगे जानकर

मुक्कदर से लड़ने का जोश मुझमे भी था
फिर जाना की वक्त भी हथियार रखता है
अंजाम-ऐ-ज़ंग क्या हुआ, क्या करोगे जानकर

बोता हर किसान अपनी फसल अरमानों से है
फिर मौसम भी होता है, पानी और पसीना भी
किस खेत में क्या फला, क्या करोगे जानकर

उनके जिस्म का हर मोड़ जानती हैं ये उंगलियाँ
उनकी खुशबू से भरपूर अब भी हैं ये उंगलियाँ
किसने किसको कहाँ छुआ, क्या करोगे जानकर

मौसम का मिजाज़ बदलते देर नही लगती
कितने बादल परछाई दिखा कर उड़ जाते हैं
वो फिर जाकर कहाँ बरसे, क्या करोगे जानकर

May 19, 2009

ख़्वाबों पे हक किसका है?

बोलो, खुशबु पे हक किसका है?
फूलों का, हवाओं या माली का?
जुल्फों मे सजा मोगरा क्या जाने

बोलो, ख़्वाबों पे हक किसका है?
रातों का, उम्मीदों या अपनों का?
बाहों मे लिपटा बदन क्या जाने

वीरान सड़कों पे हक किसका है?
हिन्दुओं, मुसलमानों, इसाईयों का?
दंगों मे उजडे जो घर, क्या जाने

अन्तिम साँसों पे हक किसका है?
संतोष का, थकान या मुक्ति का?
तिजोरी को तकते बेटे क्या जाने

March 22, 2009

कोयल डाल पर मौसम ढूंढती है

शायद इन ही रास्तों पे मिलेंगे वो
ये सोच कर टहलता हूँ हर शाम
कोयल डाल पर मौसम ढूंढती है

वो मिलते भी हैं तो घड़ी दो घड़ी
उस वक्त उनसे शिकवा क्या करें
ख्वाब है, आखें मूँद लें की खोल दें

कई दिन हुए मुझे ख़ुद से मिले हुए
आज शाम क्यों न चलें दोनों सैर पर
आईने से पूछो वो कितना अकेला है

अब मेरा ख्याल भी नागवार उन्हें
कभी पूरी रात बहुत छोटी लगती थी
आज शबनम से मैला हो रहा फूल है

March 02, 2009

मौसम के साथ खिले कुछ फूल

[Copied over from my old blog storyteller.blogspirit.com]

मौसम के साथ खिले कुछ फूल
दरख्त की जड़ों पुर लग चुकी दीमक
शाख को क्या मालूम

तलवारों ने पहनी शौर्य की धार
आधी तनख्वा पे बिके सेनापति
सैनिकों को क्या मालूम

श्रद्धा से झुकाया मन्दिर मे सर
लालच और ज़हर से सना हुआ दिल
दुआओं को क्या मालूम

जब होते हैं वो बस उन्हें देखते हैं
उनकी याद फिर मे तुम्हे देखते हैं
उनको क्या मालूम, तुमको क्या मालूम