Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

January 02, 2020

कल की सुबह

न हो प्रेम पर सियासत
न प्रेम करना मुसीबत
न हो सवाल रंग, लिंग और मत
कल की सुबह भोपाली
बस प्रेम हो इंसां की विरासत

ये सरहदें कल न थी न होंगी
ये मसीहा कल न थे न होंगे
क्या सही-गलत जो हम न होंगे
ये चेहरे आज की छपाई हैं 
कल सूरतों पर रंग नये होंगे

जहाँ डर वहां समाज कैसा
जहाँ झूठ वो अखबार कैसा
मरे मज़दूर वो बाज़ार कैसा
आज कागज़ी पहचान जो हो
कल इंसान हो इंसान जैसा

न छोटे को डर हो बड़े का 
न बड़े को डर हो छोटे का 
बंद हो व्यापार भय का
हम सुनें भी और सुनने भी दें
कल मोल हो कम कहने का

शुरुआत बड़ी न हो, पर हो
उम्मीद पक्की न हो, पर हो
हिम्मत पूरी नहीं, पर हो
छोटे क़दमों से तय बड़े फासले
कल पहला कदम रास्ते पर हो

March 30, 2014

आओ नए मेहमान

खिड़कियाँ नयी हवाओं को बुला रहीं
दरवाज़े नए मौसम को दावत दे रहे
दिये नए रंगों कि रौशनी से जगमग
कालीन नयी आहट को बुला रहे

रोशनाई नयी सोच को खोज रही
किताबें नयी कविताओं को ढून्ढ रहीं
सुराही को नए रस कि प्यास है
तस्वीरें नए किरदार को बुला रहीं

आओ नए मेहमान नयी हवाओं कि तरह
नए मौसम कि तरह, नए रंगों कि तरह
तुम्हारे नन्हे क़दमों कि आहट से
पवित्र कर दो यह घर मंदिर कि तरह

आओ नए मेहमान नयी सोच लेकर
नयी कवितायें लेकर , नए रस लेकर
अपने किरदार से जोड़ दो नए अध्याय
मेरे जीवन को नन्हे हाथों से छुकर

आओ नए मेहमान, आओ

February 13, 2012

दिन बीता सो बीता

क्यों जोड़ते हो शब्दों को
क्यों कहते हो कविता
किस काम का ये हिसाब
दिन बीता सो बीता

अनजाने में ही कभी
शब्दों में निकल आएगा
जो छुपा कर रखा है कंही
जग ज़ाहिर हो जायेगा

जिस ह्रदय में जितना मर्म
उतने उसके शब्द सरल
जितनी उपमा करे कवि
उतने उसके भाव तरल

क्यों लड़ते हो सपनो से
क्यों छिपाते हो नींदों में
दिन में वही तो खोजते हो
जो ढूंडा करते हो रातों में

October 07, 2011

प्यार और डर

जब दिल प्यार से भर जायेगा
तब दिल डर से भर जायेगा

जितना हम चाहते हैं तुम्हे
उनता ही डरते हैं तुम्हारे लिए
दुनिया बेईमान है, वक़्त बेरहम
जब अपनों से घर भर जायेगा
अंधविश्वासों से घर भर जायेगा

अपनों की मुस्कराहट जो है
ताक़त भी है, कमजोरी भी
ज़िन्दगी उसी पर टिकी हुई
खुशियाँ बटोरने जो जायेगा
खुशियों बचाता रह जायेगा

जब दिल प्यार से भर जायेगा
तब दिल डर से भर जायेगा

September 10, 2011

डूबता जा रहा हूँ मैं

यूँ खुद से भागने की कोशिश में
देखो खुद में ही कितना
डूबता जा रहा हूँ मैं
अतीत के गहरे पानी में
डूबता जा रहा हूँ मैं
आज मैं जो भी हूँ
जो देखा सीखा इतने बरस
उनके छोटे छोटे तिनकों से
बनी हस्ती मेरी
मेरी हस्ती के इन तिनकों को
बटोरता हुआ इनमे ही
डूबता जा रहा हूँ मैं
आँखें बंद करके चलो
तो रास्ते का डर नहीं रहता
पर पहुंचोगे कहाँ
इसका भी ठिकाना नहीं फिर
जो सोची मंजिल पे पहुँचने की हो लालसा
आँखें तो खुली रखनी पड़ेंगी
अपने रास्ते के नजारों में
डूबता जा रहा हूँ मैं
जाने कहाँ भाग रहा हूँ मैं
जाने क्या बटोर रहा हूँ मैं
जाने क्या देख रहा हूँ मैं
बस, डूबता जा रहा हूँ मैं

August 03, 2011

यूँ करना

जिस रात सुबह की आस छूट जाये
खुदा यूँ करना की मेरी नींद न खुले

अपने जब ख्वाब के किरदार न रहें
उन्हें बिस्तर पे हाथ जब न टटोले
जिस रात खुदगर्जी हावी हो जाये
खुदा यूँ करना की मेरी नींद न खुले

जब सफ़र से बड़ी हो जाये मंजिल
जब ईमान की कीमत आंकने लगें
जिस रात करवट पे सिक्के गिर जाये
खुदा यूँ करना की मेरी नींद न खुले

जब बिन दोस्तों के उठा लें जाम
बेसुध होने की तलब में पिया करें
जिस रात साकी से मन भर जाये
खुदा यूँ करना की मेरी नींद न खुले

जिस रात सुबह की आस छूट जाये
खुदा यूँ करना की मेरी नींद न खुले

May 28, 2011

ज़िन्दगी बाकि है जागो

यादों के कारवां जहाँ
संग ले जाएँ जाने कहाँ
रुक जाएँ कंही अगर
ढूंढे हमे कोई कहाँ

पल पल का हिसाब मांगो
ज़िन्दगी बाकि है जागो
गुज़रा पल धुवाँ हो जाता है
उस धुवें से दूर भागो

मंजिलों पर रस्ते नहीं रुकते
आंधी मे बरगद नहीं झुकते
पहुंचे जो ऊंची चोटियों पर
वो नदी किनारे नहीं बसते

May 19, 2011

गीत छोड़ गया कोई

साँसों पर जोर नहीं लेकिन
हौसला क्या छीनेगा कोई
कारवां रुक गया कंही पीछे
पर राही चलता रहा कोई

क़दमों के निशां नहीं बाकी
उसकी मंजिल का नहीं पता
यहाँ से गुज़रा जो मुसाफिर
पीछे गीत छोड़ गया कोई

फूलों पर आया प्यार जिन्हें
वो तोड़ ले गए संग अपने
एक मौसम वो भी आया
उनके कांटे ले गया कोई

उनकी बातों में खुशबू है
महक जाए जो मिले उनसे
कल शाम कुछ यूँ हुआ
उन्हें महका गया कोई

January 16, 2011

दोराहा

तुम जो हो कैसे हो
न ज़रा भी मेरे जैसे हो
कहते हैं तुम न अपने
काश अपने तुम जैसे हो

वक़्त गुज़रता गया
तुम्हारी आदत हो गयी
तुम्हे अलग न समझा
हमारी एक हस्ती हो गयी

सच ये भी है की तुम्हारे
ख्वाब अलग, जुदा मजिल
यूँ मुझ में जो रमे रहे
तो कैसे होंगे सब हासिल

ये बंधन जो है कैसा है
न ढीला और न बंधा सा है
इस मकाम पर खड़े हैं आज
आगे बंटता दोराहा सा है

December 29, 2010

मौसम की पहली बर्फ

रात क्या कर गयी
सोते हुए शहर पर
बर्फ बिछा गयी

यह सफ़ेद नया सा है
पानी मौसमी इश्क में
पिसे मोती सा है

धूप मैला कर जाए
यह ऐसा निर्मल तोहफा
आँखों में बस जाए

रात क्या कर गयी
सोते हुए शहर पर
बर्फ बिछा गयी

October 24, 2010

छूटता सा जाता है

घडी घडी न पूछो तुम्हे कितना चाहते हैं
खुद पर यकीन कम होता सा जाता है

समय के साथ हमने तरक्की बहुत की
ऊपर से गिरने का डर बढता सा जाता है

ख्वाबों को रोकने की कोई तरकीब हो
चंचल मन सच से भागता सा जाता है

कोई पूछे तो क्या कहें की क्या पाया
जो भी पाया वो हर दम छूटता सा जाता है

September 21, 2010

हौसला भी कमाल की चीज़ है

हौसला भी कमाल की चीज़ है...
अंधेरों मे चिराग हो जाता है
पतझड़ मैं पराग हो जाता है
पराजय मे उम्मीद हो जाता है
गैरों का मुरीद हो जाता है
दंगो मे विश्वास हो जाता है
विरानो मे निवास हो जाता है
दोस्तों मे पैमाना हो जाता है
इश्क मे अफसाना हो जाता है
मंदिर मे भगवान हो जाता है
हादसों मे इंसान हो जाता है
... हौसला भी कमाल की चीज़ है

March 10, 2010

ये क्या कम है

ये क्या कम है
की अब तनहा नहीं होते कभी
तेरी यादें और हम हैं

मौसम चंचल है
रिमझिम बरस पड़ता है कभी
आखें इस वजह नम हैं

ख्वाब बंजारा है
यूँ ही आवारा भटकता है कभी
बस इसलिए नींदें कम हैं

वक़्त तो राही है
ये मेरे रोके से रुका है कभी
रुके हुए तो बस हम हैं

November 03, 2009

तुम बहुत अज़ीज़

तुम बहुत अज़ीज़ हो मुझे मगर
मेरी तकदीर के हिस्सेदार नहीं
बस साथ चलो हाथ पकड़कर
दिखाओ दोराहों पर दिशा नहीं

तुम लेना चाहते हो मेरे गम
और देना चाहते हो अपनी खुशियाँ
अगर ये सौदा हो सकता
दोस्तों की ज़रुरत पड़ती नहीं

तुम्हारी खुशियों पर चुप
तुम्हारी तकलीफ मे मौन
मेरी बेरुखी नहीं है दोस्त
मैं ज्यादा ज़ाहिर करता नहीं

इस मौसम बीमार पड़े हम
पिछले मौसम नासाज़ रहे तुम
तुम्हे जो दावा असर कर गयी
वो इस मौसम हमे लगी नहीं

June 29, 2009

वृंदा का श्रृंगार

शाम होते ही वृंदा करती है श्रृंगार

ढलता सूरज जैसे उठकर
माथे पर आ बैठा हो
यूँ बिंदिया सजाती है
पसीने के मोतियों का ताज
बिना बगावत देती है उतार
शाम होते ही वृंदा करती है श्रृंगार

झरने का पानी ज्यों टूटे
तार-तार बहते दिन भर
यूँ केश घने सुलझाती है
उनमे बांधे फूलों की वेणी
ओढ़ लेती मौसम की बहार
शाम होते ही वृंदा करती है श्रृंगार

जैसे महीनों धूप देखो
फिर भी न भूले रंग हरा
यूँ ही प्रिय का कोमल स्पर्श
ठहरा जीवंत कटिबंध में
उससे कमर देती है सवांर
शाम होते ही वृंदा करती है श्रृंगार

June 03, 2009

सफर बस उतना ही कटता रहा ऐ दिल

यादों की बगिया सींचता रहा ऐ दिल
मौसम फिर से बेरंग जाता रहा ऐ दिल

क़दमों को बढाकर गिनता रहा ऐ दिल
सफर बस उतना ही कटता रहा ऐ दिल

साहिब मकान ऊँचा करता रहा ऐ दिल
पंछी पेड़ पर घोसला बुनता रहा ऐ दिल

हर मौसम नया वादा करता रहा ऐ दिल
क्या करे जो मौसम बदलता रहा ऐ दिल

दिन वो भी थे हौसला साथ रहा ऐ दिल
अब टूट गए, वक्त रोंद्ता रहा ऐ दिल

वो डरा हुआ लड़का चलता रहा ऐ दिल
मैं जेब मे बटुआ ढूँढता रहा ऐ दिल

May 22, 2009

आँगन में लगा आम का पेड़ हरा है

मकान की दीवारें बेरंग हैं तो क्या
आँगन में लगा आम का पेड़ हरा है

एक चम्मच शक्कर गिरी मेज़ पर
उस तरफ़ चीटियों का कारवां चला है

मुमकिन ये भी है की वो बेवफा न हो
यही सोच आशिक दुनिया से चला है

पतझड़ मे फूल मुरझा गए तो क्या
ये चमन अब भी उम्मीदों से भरा है

सरकारें बाट रही हैं मुफ्त मे रोटियां
मजदूरों के औजारों में क्या धरा है

अकेला था तो चाहा कोई हाथ थाम ले
अब मेले में नयन-नक्श जांच रहा है

शहर की सड़कें

शहर की सड़कों पर
नियम से चलने का
अब फैशन न रहा

उपमा से उठकर
अब यथार्थ मे हैं
संघर्ष का मैदान
उन पर निश्चिंत हो,
गुनगुनाते चलने का
आराम न रहा

न जाने कितनो के
प्राण ले चुकीं ये
सड़क हो गई जैसे
रक्तरंजित रणभूमि
यहाँ मरते को देख
रुकने का समय न रहा

जानवरों, पंछियों को भी
अपने हमसफ़र से
यूँ विमुख, बेपरवाह
चलते, उड़ते नही देखा
रेखाओं से बंटी सड़क पे
दोस्ती का लेन न रहा

May 18, 2009

ये ज़िन्दगी है, ख्वाब नही

ये ज़िन्दगी है, ख्वाब नही,
सुबह इसे कुछ और जीना पड़ेगा

मील के पत्थर अभी चुप हैं
राही को कुछ और भटकना पड़ेगा

मैं उनकी जुल्फों के गिरफ्त में हूँ
इनसे निकलूँ तो फिर सवेरा पड़ेगा

सफर ख़त्म हुआ तो मन उदास है
फिर किसी नई डगर चलना पड़ेगा

April 26, 2009

यादों की मुट्टी खोलो

मुझे भूलना बहुत आसान है
कोशिश कर के देखो ज़रा
जज़्बात वक्त का मेहमान है

पिंजडा खोलो, पंछी उड़ जाएगा
जब यादों की मुट्टी खोलोगी
मेरा हर निशान मिट जाएगा

न सोचो क्या होगा बिन मेरे
तुम सावन, पथझड बसेरा मेरा
सोचो क्या होगा संग मेरे

आयेंगे हसीं मोड़ रस्ते में कई
ख्वाबों में जियोगी यूँ ही कब तक
साथ देंगे तुम्हारा हमसफ़र कई

मान लो एक दौर था जो गुज़र गया
रास्ता भटक आ पहुँचा था तेरे द्वार
मोसम था एक, जो अब बदल गया