October 23, 2010

पल पल ज़िन्दगी की गवाही खुद ही

यूँ अरमानो की तबाही खुद ही
पल पल ज़िन्दगी की गवाही खुद ही

तेरी वफादारी के झूठे किस्से
बैठे बैठे यारों को सुनाते खुद ही

सर्द हवाओं में हौसला इस तरह
तिल तिल कर जलते जाते खुद ही

मीलों चले कोई राहगीर न मिला
रुक रुक के रास्तों से बातें खुद ही

कौन कहे की वक़्त यूँ ही ज़ाया किया
पल पल का हिसाब रखते चले खुद ही

September 21, 2010

हौसला भी कमाल की चीज़ है

हौसला भी कमाल की चीज़ है...
अंधेरों मे चिराग हो जाता है
पतझड़ मैं पराग हो जाता है
पराजय मे उम्मीद हो जाता है
गैरों का मुरीद हो जाता है
दंगो मे विश्वास हो जाता है
विरानो मे निवास हो जाता है
दोस्तों मे पैमाना हो जाता है
इश्क मे अफसाना हो जाता है
मंदिर मे भगवान हो जाता है
हादसों मे इंसान हो जाता है
... हौसला भी कमाल की चीज़ है

August 16, 2010

कल की शाम

महफिलों में गुजरी कल की शाम
बड़ी तनहा गुजरी कल की शाम

हंस के बोला कई हसीनों से मैं
तुझे बहुत ढूंडा कल की शाम

ये इश्क का खेल भी अजीब है
येही सोचता रहा कल की शाम

आशिकों का यूँही बड़ा नाम है
बेसुध कई मिले कल की शाम

अकेलापन रंग बदलता है
सुर्ख लाल था कल की शाम

August 07, 2010

यादों में जियें कब तक

वीरान राहों पे सफ़र कब तक
खुद से अपनी बातें कब तक

नए मौके हर कदम पे बिछे
चूके मौकों पे रंज कब तक

बरस दिन-दिन कर गुज़र गया
बीते बरस की यादें कब तक

यादों की कीमत क्या आकें
यादों की तिजारत कब तक

मैं नशे मे क्या कुछ कह गया
मेरी बातों का गिला कब तक

वक़्त फिसल गया पता न चला
अब बिखरे लम्हे चुनें कब तक

July 02, 2010

हवा कहाँ चली

खुशबू समेटते हुए हवा कहाँ चली
मौसम बदलते हुए हवा कहाँ चली

ख़्वाबों का पिटारा पलकों पे उठाये
उम्मीदों के रास्ते हवा कहाँ चली

पहचाने से चेहरे यादों से चुनकर
राहों पे मिलाती हवा कहाँ चली

एक बच्चे की हंसी परचम बनाये
ग़म को मिटाती हवा कहाँ चली

घरोंदों में बैठे अरमानों के पंछी
उन्हें साथ उड़ाते हवा कहाँ चली

July 01, 2010

शाम के अंधेरों से क्या डरे

First Posted: 30 Jun, 2010 / Edited: 01 Jul, 2010

आगे बढ़ने के मौके कम मिले
मौकों पे हम बढ़ते कम मिले

कश्तियाँ रेत घिसती रह गयीं
पतवार उठाते बाज़ू कम मिले

कुछ चेहरों में नूर होता है
मेरे माथे पे तारे कम मिले

हमारी बेवफाई गिनी न गयी
हमे वफादार महबूब कम मिले

शाम के अंधेरों से क्या डरे
जिसे दिन में उजाले कम मिले

May 03, 2010

यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो

एक बेहद खूबसूरत पुराने फ़िल्मी गीत से पहली लाइन लेकर आगे लिखने की कोशिश...

लग जा गले की फिर ये हसीं रात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो

इस बेखुदी का सिला है ये एहसास जो नए
लो ओढ़ लो मेरे जिस्म के लिबास ये नए
मौसम की ये आखिरी सर्द रात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो

आँखों से चूम लो हमे होठों से देख लो
सुन लो बदन हाथों से कोई ग़ज़ल कहो
मर्ज़ी की अपने कल ये कायनात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो

लग जा गले की फिर ये हसीं रात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो