August 11, 2011

खुशियों के मैदान बनेंगे

मुश्किलों के पहाड़ टूटेंगे
खुशियों के मैदान बनेंगे

कल की तस्वीर उभरेगी
बच्चों से पूछो क्या बनेंगे

ख्वाब सोती आँखों ने देखे
भला रंगीन कैसे बनेंगे

मेरा इमान बहुत सस्ता है
मेरे महेंगे मकान बनेंगे

अब निकम्मे तो हो चुके
देखो आशिक कब बनेंगे

August 03, 2011

यूँ करना

जिस रात सुबह की आस छूट जाये
खुदा यूँ करना की मेरी नींद न खुले

अपने जब ख्वाब के किरदार न रहें
उन्हें बिस्तर पे हाथ जब न टटोले
जिस रात खुदगर्जी हावी हो जाये
खुदा यूँ करना की मेरी नींद न खुले

जब सफ़र से बड़ी हो जाये मंजिल
जब ईमान की कीमत आंकने लगें
जिस रात करवट पे सिक्के गिर जाये
खुदा यूँ करना की मेरी नींद न खुले

जब बिन दोस्तों के उठा लें जाम
बेसुध होने की तलब में पिया करें
जिस रात साकी से मन भर जाये
खुदा यूँ करना की मेरी नींद न खुले

जिस रात सुबह की आस छूट जाये
खुदा यूँ करना की मेरी नींद न खुले

July 25, 2011

पूछो

क्या गुजरी हम पर बीते साल तो पूछो
इतनी मुद्दत बाद मिले हो हाल तो पूछो

दम टूटा दर्द भरी सिसकियाँ निकलीं
कितने खंजर हुए सीने के पार तो पूछो

तेरी महफ़िल में आये तो दोस्तों के साथ
घर लौटे हम कितने सूने हाल तो पूछो

आशिक ख़ाक छाने तो काफिर कहते हो
उसे कब ज़रुरत मस्जिदों की ये तो पूछो

July 02, 2011

ये शहर नहीं छूटता

तू रहता है यहाँ इस वजह ये शहर नहीं छूटता
जाएँ और कहाँ इस वजह ये शहर नहीं छूटता

मोहल्ले में आज भी दुआ-सलाम हो जाता है
पहचाने कोई और कहाँ ये शहर नहीं छूटता

हज़ार तरकीबें की तुझे भूल जाने को मगर
दफन मेरा इश्क यहाँ ये शहर नहीं छूटता

ये खुशबू न इत्र की है न तेरे आगोश की
इन हवाओं से मिली जो ये शहर नहीं छूटता

ख़्वाबों की डोर पे उडी उम्मीदों की पतंग
अफसानों की गलियों से ये शहर नहीं छूटता

यंही ख़ाक हो जाएँ तो भी कोई याद न करे
जो मुड कर न पूछे तो भी ये शहर नहीं छूटता

May 28, 2011

ज़िन्दगी बाकि है जागो

यादों के कारवां जहाँ
संग ले जाएँ जाने कहाँ
रुक जाएँ कंही अगर
ढूंढे हमे कोई कहाँ

पल पल का हिसाब मांगो
ज़िन्दगी बाकि है जागो
गुज़रा पल धुवाँ हो जाता है
उस धुवें से दूर भागो

मंजिलों पर रस्ते नहीं रुकते
आंधी मे बरगद नहीं झुकते
पहुंचे जो ऊंची चोटियों पर
वो नदी किनारे नहीं बसते

May 19, 2011

गीत छोड़ गया कोई

साँसों पर जोर नहीं लेकिन
हौसला क्या छीनेगा कोई
कारवां रुक गया कंही पीछे
पर राही चलता रहा कोई

क़दमों के निशां नहीं बाकी
उसकी मंजिल का नहीं पता
यहाँ से गुज़रा जो मुसाफिर
पीछे गीत छोड़ गया कोई

फूलों पर आया प्यार जिन्हें
वो तोड़ ले गए संग अपने
एक मौसम वो भी आया
उनके कांटे ले गया कोई

उनकी बातों में खुशबू है
महक जाए जो मिले उनसे
कल शाम कुछ यूँ हुआ
उन्हें महका गया कोई

May 06, 2011

तुम्हे ही हमसफ़र मान बैठे

मसला हल करने जो बैठे
चमन को सरहदों से बाँट बैठे

तुम जो कुछ साथ चले
तुम्हे ही हमसफ़र मान बैठे

कश्तियाँ टूट के बिखर गयी
नाविक तिनके की आस पे बैठे

दिन में टूटा जो मजदूर
शाम को तारों की छाँव में बैठे

नायक की छवि तो उभरे
कब तक किरदार लिए बैठे