February 13, 2012

दिन बीता सो बीता

क्यों जोड़ते हो शब्दों को
क्यों कहते हो कविता
किस काम का ये हिसाब
दिन बीता सो बीता

अनजाने में ही कभी
शब्दों में निकल आएगा
जो छुपा कर रखा है कंही
जग ज़ाहिर हो जायेगा

जिस ह्रदय में जितना मर्म
उतने उसके शब्द सरल
जितनी उपमा करे कवि
उतने उसके भाव तरल

क्यों लड़ते हो सपनो से
क्यों छिपाते हो नींदों में
दिन में वही तो खोजते हो
जो ढूंडा करते हो रातों में

January 17, 2012

हमसे साल नया फिर मिलने को है

उम्मीद को नया बहाना मिलने को है
हमसे साल नया फिर मिलने को है

दोस्त हमारे ये कह कर बुला लेते हैं
मैखाने में हम से कोई मिलने को है

उनकी बातें सुनने बादल भी चले आये
बेमौसम पानी की बूँदें मिलने को है

वो बूढ़ा आशिक पूरी शाम खामोश रहा
यकीनन कुछ नयी ग़ज़लें मिलने को है

सच न पूछो आडम्बर मेरा धूल जाएगा
दोस्त पुराना आज हमारा मिलने को है

जिन पेड़ों पर हमने अपने नाम खरोचे
शहर की सड़कें उन पेड़ों से मिलने को है

November 14, 2011

रंग भरने का जी करता है

इश्क में डूबे दिल को कहाँ सुकून रहता है
वो तो जाने कितने वहमों से भरा रहता है

ये महफ़िल भी बहाना है, क्या रखा इसमें
हर बार ही तेरे आने का इंतज़ार रहता है

सड़क की चहल-पहल से शहर नहीं बसते
ये तो लोगों की तहज़ीब से बसा करता है

कुछ कदम चल कर हार जाने को तैयार
ऐसे मंसूबों से कोई सफ़र किया करता है

कई सालों बाद एक तस्वीर बनायीं मैंने
मुझे भी कभी रंग भरने का जी करता है

मेरे लतीफों पर हँसते हैं सभी महफ़िल में
मेरे लतीफों में मेरा ही किरदार रहता है

October 16, 2011

नदी के उस पार इंसान खुश रहता है

नदी के उस पार इंसान खुश रहता है
इस पार हर दिल में ये वहम रहता है

उनके हौसले की कहानियाँ हैं मशहूर
बिस्तर को इल्म तकिया नम रहता है

उन्हें कितनो से दिल लगाते देखा सबने
कौन जाने उनके दिल में कौन रहता है

मीलों के सफ़र की मंजिल ये इम्तेहान
पीठ पे लदे गठरे में छुपा डर रहता है

जब हद के पार रक्तरंजित हो जाए रण
क्षितिज पे उदास गौतम खड़ा रहता है

इस अनजान शहर में बस एक आसरा
मेरे गाँव का दुश्मन पडोसी रहता है

शोहरत की बुलंदियां कौन नहीं चाहता
तारों पे बस कुछ का नाम लिखा रहता है

कभी फुर्सत मिले तो हमसे आकर मिलो
अब भी हर खड़ी तुम्हारा ख्याल रहता है

October 07, 2011

प्यार और डर

जब दिल प्यार से भर जायेगा
तब दिल डर से भर जायेगा

जितना हम चाहते हैं तुम्हे
उनता ही डरते हैं तुम्हारे लिए
दुनिया बेईमान है, वक़्त बेरहम
जब अपनों से घर भर जायेगा
अंधविश्वासों से घर भर जायेगा

अपनों की मुस्कराहट जो है
ताक़त भी है, कमजोरी भी
ज़िन्दगी उसी पर टिकी हुई
खुशियाँ बटोरने जो जायेगा
खुशियों बचाता रह जायेगा

जब दिल प्यार से भर जायेगा
तब दिल डर से भर जायेगा

September 10, 2011

क्या करते

गर शराब न होती तो क्या करते
तुझे याद करते ज़ाया हुआ करते

गली में मेला लगा लोग मिले
हम वहां जाकर भी क्या करते

उनसे मिलने का वादा तोड़ दिया
डरे हुए आशिक और क्या करते

अक्सर अपनी बेमानी पे ग़म होता है
सोचते हैं काबिल होते तो क्या करते

कुछ मुरीद मेरे आज भी हैं
कहते हैं जो चाहे जाने क्या करते

जाने मेरा लिखा कौन पढ़े
पर दिल में रखकर भी क्या करते

डूबता जा रहा हूँ मैं

यूँ खुद से भागने की कोशिश में
देखो खुद में ही कितना
डूबता जा रहा हूँ मैं
अतीत के गहरे पानी में
डूबता जा रहा हूँ मैं
आज मैं जो भी हूँ
जो देखा सीखा इतने बरस
उनके छोटे छोटे तिनकों से
बनी हस्ती मेरी
मेरी हस्ती के इन तिनकों को
बटोरता हुआ इनमे ही
डूबता जा रहा हूँ मैं
आँखें बंद करके चलो
तो रास्ते का डर नहीं रहता
पर पहुंचोगे कहाँ
इसका भी ठिकाना नहीं फिर
जो सोची मंजिल पे पहुँचने की हो लालसा
आँखें तो खुली रखनी पड़ेंगी
अपने रास्ते के नजारों में
डूबता जा रहा हूँ मैं
जाने कहाँ भाग रहा हूँ मैं
जाने क्या बटोर रहा हूँ मैं
जाने क्या देख रहा हूँ मैं
बस, डूबता जा रहा हूँ मैं