March 30, 2014

आओ नए मेहमान

खिड़कियाँ नयी हवाओं को बुला रहीं
दरवाज़े नए मौसम को दावत दे रहे
दिये नए रंगों कि रौशनी से जगमग
कालीन नयी आहट को बुला रहे

रोशनाई नयी सोच को खोज रही
किताबें नयी कविताओं को ढून्ढ रहीं
सुराही को नए रस कि प्यास है
तस्वीरें नए किरदार को बुला रहीं

आओ नए मेहमान नयी हवाओं कि तरह
नए मौसम कि तरह, नए रंगों कि तरह
तुम्हारे नन्हे क़दमों कि आहट से
पवित्र कर दो यह घर मंदिर कि तरह

आओ नए मेहमान नयी सोच लेकर
नयी कवितायें लेकर , नए रस लेकर
अपने किरदार से जोड़ दो नए अध्याय
मेरे जीवन को नन्हे हाथों से छुकर

आओ नए मेहमान, आओ

November 24, 2013

तुम्हारी शर्तों पर तुम्हे प्यार करें तो कैसे

तुम्हारी शर्तों पर तुम्हे प्यार करें तो कैसे
तुम पर अपनी हस्ती निसार करें तो कैसे

तुम मुस्कुरादो तो दिन खूबसूरत हो जाये
सोच रहे कि आज तुम्हे हंसाएँ तो कैसे

ज़िन्दगी कि हर मिठास खट्टी हो जायेगी
गुस्से में हम तुम्हे भला बुरा कहें तो कैसे 

तुम से किया हर वादा हम निभाएंगे मगर
तुम्हारे मन में छुपे डर को हटाएं तो कैसे

हर आशिक़ी में दिलचस्प मोड़ आतें हैं
हर मोड़ पे आशिक़ हँसता मिले तो कैसे 

October 12, 2013

ज़िंदगी के साथ चलता रहा कोई

ज़िंदगी के साथ चलता रहा कोई
हंसता रहा कोई रोता रहा कोई

एक पुरानी किताब महक उठी
पन्नों मे फूल दबा गया कोई

कोई इतना खामोश है तो क्यों
उस से जाने क्या कह गया कोई

यहाँ दोस्तों से इतनी दूर आ गये
क्या वहाँ हमे पूछता होगा कोई

सवाल ऐसे की जवाब बेमानी लगें
ये किस मकाम पे छोड़ गया कोई

क्या है इस ज़िंदगी का सबब
मिलाओ उस से जो जानता हो कोई
 

October 24, 2012

काफ़िर यूँ भी सोचता है कभी कभी

काफ़िर यूँ भी सोचता है कभी कभी
क्या हर्ज़ जो मस्जिद चलें कभी कभी 

यूँ तो बेसुध होने आते हैं तेरे दर साकी 
कर रहम शराब पानी हो जाये कभी कभी

सपने पिघल जाते हैं हलकी सी धुप में
सूरज देखे जो ख्वाब तो कैसे कभी कभी

शाखें मेज़ बन गयीं और पत्तियां किताबें
मौसम के हारों को पढ़ के देखो कभी कभी

सड़कों को मेरा वज़न क्या महसूस होगा
हम इन्ही की बाहों में गिरे हैं कभी कभी

जो रात के अंधेरों में छुप कर लिखे
उन शेरों को महफ़िल में पढो कभी कभी  

August 24, 2012

तो अच्छा

कुछ खतों के जवाब न आयें तो अच्छा
कुछ ख्वाब उठते बिसर जाएँ तो अच्छा

तुम से मिले तो बहुत सी उम्मीदें जगी
अगर तुम कुछ दूर साथ चलो तो अच्छा

शायद दुवाओं से भी फूल खिल जाएँ कंही
मांगे से यूं बहार मिल जाये तो अच्छा

वक़्त की पेचीदगी समझ भी गए तो क्या
ना समझे ही पार कर जाएँ तो अच्छा

दोस्तों से कहें कैसे की फिर आवारा हो चले
उन्हें खबर हमारी ज़माने से हो तो अच्छा

दर्द एक सोच है इसे महसूस न करो
ये दिल तक न पहुँचने पाए तो अच्छा 

April 18, 2012

दिल टूट सकता है

ख्वाबों में जियें या हकीकत में की हर सूरत में दिल टूट सकता है
ये सोच कर सीधे चले जाते हैं की हर मोड़ पर दिल टूट सकता है

ख्वाहिशों की शीशी जो खोल लें तो उसकी खुशबू फिर रुकेगी नहीं
यूँ फैल जाएगी हर जगह की दुनिया में रामा दिल टूट सकता है

उनके झूठे वादों पर इस कदर यकीन हो चला अब हमे
किसी शाम वो आ ही जाएँ हम से मिलने तो दिल टूट सकता है

बड़ी उम्मीदों से कश्ती लेकर उतरे हैं तूफानी मौजों पर हम
जो इस बार दरिया ने हमे नहीं अपनाया तो दिल टूट सकता है

हमारी खुशियों का क्या मोल अगर हमारे अपने अज़ीज़ खुश नहीं
उनकी आँखें ज़रा सी नम हो तो एक पल में दिल टूट सकता है

तुम्हारी देहलीज पर भी आकर बैठ जाएँ कुछ देर साकी
शहर में तो टूट ही चुका मैखाने में देखें क्या दिल टूट सकता है

February 13, 2012

दिन बीता सो बीता

क्यों जोड़ते हो शब्दों को
क्यों कहते हो कविता
किस काम का ये हिसाब
दिन बीता सो बीता

अनजाने में ही कभी
शब्दों में निकल आएगा
जो छुपा कर रखा है कंही
जग ज़ाहिर हो जायेगा

जिस ह्रदय में जितना मर्म
उतने उसके शब्द सरल
जितनी उपमा करे कवि
उतने उसके भाव तरल

क्यों लड़ते हो सपनो से
क्यों छिपाते हो नींदों में
दिन में वही तो खोजते हो
जो ढूंडा करते हो रातों में