हौसला भी कमाल की चीज़ है...
अंधेरों मे चिराग हो जाता है
पतझड़ मैं पराग हो जाता है
पराजय मे उम्मीद हो जाता है
गैरों का मुरीद हो जाता है
दंगो मे विश्वास हो जाता है
विरानो मे निवास हो जाता है
दोस्तों मे पैमाना हो जाता है
इश्क मे अफसाना हो जाता है
मंदिर मे भगवान हो जाता है
हादसों मे इंसान हो जाता है
... हौसला भी कमाल की चीज़ है
September 21, 2010
August 16, 2010
कल की शाम
महफिलों में गुजरी कल की शाम
बड़ी तनहा गुजरी कल की शाम
हंस के बोला कई हसीनों से मैं
तुझे बहुत ढूंडा कल की शाम
ये इश्क का खेल भी अजीब है
येही सोचता रहा कल की शाम
आशिकों का यूँही बड़ा नाम है
बेसुध कई मिले कल की शाम
अकेलापन रंग बदलता है
सुर्ख लाल था कल की शाम
बड़ी तनहा गुजरी कल की शाम
हंस के बोला कई हसीनों से मैं
तुझे बहुत ढूंडा कल की शाम
ये इश्क का खेल भी अजीब है
येही सोचता रहा कल की शाम
आशिकों का यूँही बड़ा नाम है
बेसुध कई मिले कल की शाम
अकेलापन रंग बदलता है
सुर्ख लाल था कल की शाम
August 07, 2010
यादों में जियें कब तक
वीरान राहों पे सफ़र कब तक
खुद से अपनी बातें कब तक
नए मौके हर कदम पे बिछे
चूके मौकों पे रंज कब तक
बरस दिन-दिन कर गुज़र गया
बीते बरस की यादें कब तक
यादों की कीमत क्या आकें
यादों की तिजारत कब तक
मैं नशे मे क्या कुछ कह गया
मेरी बातों का गिला कब तक
वक़्त फिसल गया पता न चला
अब बिखरे लम्हे चुनें कब तक
खुद से अपनी बातें कब तक
नए मौके हर कदम पे बिछे
चूके मौकों पे रंज कब तक
बरस दिन-दिन कर गुज़र गया
बीते बरस की यादें कब तक
यादों की कीमत क्या आकें
यादों की तिजारत कब तक
मैं नशे मे क्या कुछ कह गया
मेरी बातों का गिला कब तक
वक़्त फिसल गया पता न चला
अब बिखरे लम्हे चुनें कब तक
July 02, 2010
हवा कहाँ चली
खुशबू समेटते हुए हवा कहाँ चली
मौसम बदलते हुए हवा कहाँ चली
ख़्वाबों का पिटारा पलकों पे उठाये
उम्मीदों के रास्ते हवा कहाँ चली
पहचाने से चेहरे यादों से चुनकर
राहों पे मिलाती हवा कहाँ चली
एक बच्चे की हंसी परचम बनाये
ग़म को मिटाती हवा कहाँ चली
घरोंदों में बैठे अरमानों के पंछी
उन्हें साथ उड़ाते हवा कहाँ चली
मौसम बदलते हुए हवा कहाँ चली
ख़्वाबों का पिटारा पलकों पे उठाये
उम्मीदों के रास्ते हवा कहाँ चली
पहचाने से चेहरे यादों से चुनकर
राहों पे मिलाती हवा कहाँ चली
एक बच्चे की हंसी परचम बनाये
ग़म को मिटाती हवा कहाँ चली
घरोंदों में बैठे अरमानों के पंछी
उन्हें साथ उड़ाते हवा कहाँ चली
July 01, 2010
शाम के अंधेरों से क्या डरे
First Posted: 30 Jun, 2010 / Edited: 01 Jul, 2010
आगे बढ़ने के मौके कम मिले
मौकों पे हम बढ़ते कम मिले
कश्तियाँ रेत घिसती रह गयीं
पतवार उठाते बाज़ू कम मिले
कुछ चेहरों में नूर होता है
मेरे माथे पे तारे कम मिले
हमारी बेवफाई गिनी न गयी
हमे वफादार महबूब कम मिले
शाम के अंधेरों से क्या डरे
जिसे दिन में उजाले कम मिले
आगे बढ़ने के मौके कम मिले
मौकों पे हम बढ़ते कम मिले
कश्तियाँ रेत घिसती रह गयीं
पतवार उठाते बाज़ू कम मिले
कुछ चेहरों में नूर होता है
मेरे माथे पे तारे कम मिले
हमारी बेवफाई गिनी न गयी
हमे वफादार महबूब कम मिले
शाम के अंधेरों से क्या डरे
जिसे दिन में उजाले कम मिले
May 03, 2010
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो
एक बेहद खूबसूरत पुराने फ़िल्मी गीत से पहली लाइन लेकर आगे लिखने की कोशिश...
लग जा गले की फिर ये हसीं रात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो
इस बेखुदी का सिला है ये एहसास जो नए
लो ओढ़ लो मेरे जिस्म के लिबास ये नए
मौसम की ये आखिरी सर्द रात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो
आँखों से चूम लो हमे होठों से देख लो
सुन लो बदन हाथों से कोई ग़ज़ल कहो
मर्ज़ी की अपने कल ये कायनात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो
लग जा गले की फिर ये हसीं रात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो
लग जा गले की फिर ये हसीं रात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो
इस बेखुदी का सिला है ये एहसास जो नए
लो ओढ़ लो मेरे जिस्म के लिबास ये नए
मौसम की ये आखिरी सर्द रात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो
आँखों से चूम लो हमे होठों से देख लो
सुन लो बदन हाथों से कोई ग़ज़ल कहो
मर्ज़ी की अपने कल ये कायनात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो
लग जा गले की फिर ये हसीं रात हो न हो
यूँ दोनों फिर बेपरवाह किसी रात हो न हो
April 14, 2010
ख्वाब देखने का मज़ा क्या रह जाए
ख्वाब देखने का मज़ा क्या रह जाए
ख्वाबों के सच होने की शर्त जो रखो
चेहरा उनका शर्म से गुलाबी हो जाए
चेहरे पे उनके हल्का हाथ जो रखो
हसीना हर कोई दिलरुबा हो सकती है
हसीनों के हर कदम पे दिल जो रखो
बात संवरकर अफसाना बन जाती है
बातें होठों से लेकर आँखों पे जो रखो
मुश्किल ये भी है की मैं झुकता नहीं
मुश्किलें तोड़ न दें ये अकड़ जो रखो
ख्वाबों के सच होने की शर्त जो रखो
चेहरा उनका शर्म से गुलाबी हो जाए
चेहरे पे उनके हल्का हाथ जो रखो
हसीना हर कोई दिलरुबा हो सकती है
हसीनों के हर कदम पे दिल जो रखो
बात संवरकर अफसाना बन जाती है
बातें होठों से लेकर आँखों पे जो रखो
मुश्किल ये भी है की मैं झुकता नहीं
मुश्किलें तोड़ न दें ये अकड़ जो रखो
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