December 29, 2010

रात बर्फ का कालीन बिछा गयी

पलकों पर रखे इतने ख्वाब
सच करो इन्हें तो बोझ कम हो

बहुत दिन हुए मंदिर गए हुए
दोस्तों से मिलो जो वक़्त कम हो

हंसी से खरीदी कर रहे हैं आज
सौदा नहीं बुरा जो नोट कम हो

रात बर्फ का कालीन बिछा गयी
पांव रखें उस पर जो इमां कम हो

मौसम की पहली बर्फ

रात क्या कर गयी
सोते हुए शहर पर
बर्फ बिछा गयी

यह सफ़ेद नया सा है
पानी मौसमी इश्क में
पिसे मोती सा है

धूप मैला कर जाए
यह ऐसा निर्मल तोहफा
आँखों में बस जाए

रात क्या कर गयी
सोते हुए शहर पर
बर्फ बिछा गयी

October 26, 2010

एहसास

खुल के जीने का एहसास क्या था
तेरे साथ होने का एहसास क्या था

तुझे भूल कर अगर मैं खुश हूँ
तो तुझे पाने का एहसास क्या था

तेरे ख़त जलकर ख़त्म हो जाते
तो उन्हें पढने का एहसास क्या था

जो मयखाने में गुजरी शाम आवारा
तो तेरे इश्क का एहसास क्या था

ज़माने हँसे मुझ पर तो ग़म क्या
तेरे मुस्कुराने का एहसास क्या था

दबे हुए तकिये मे अब भी कुछ ख्वाब
उन्हें संग देखने का एहसास क्या था

October 24, 2010

छूटता सा जाता है

घडी घडी न पूछो तुम्हे कितना चाहते हैं
खुद पर यकीन कम होता सा जाता है

समय के साथ हमने तरक्की बहुत की
ऊपर से गिरने का डर बढता सा जाता है

ख्वाबों को रोकने की कोई तरकीब हो
चंचल मन सच से भागता सा जाता है

कोई पूछे तो क्या कहें की क्या पाया
जो भी पाया वो हर दम छूटता सा जाता है

October 23, 2010

पल पल ज़िन्दगी की गवाही खुद ही

यूँ अरमानो की तबाही खुद ही
पल पल ज़िन्दगी की गवाही खुद ही

तेरी वफादारी के झूठे किस्से
बैठे बैठे यारों को सुनाते खुद ही

सर्द हवाओं में हौसला इस तरह
तिल तिल कर जलते जाते खुद ही

मीलों चले कोई राहगीर न मिला
रुक रुक के रास्तों से बातें खुद ही

कौन कहे की वक़्त यूँ ही ज़ाया किया
पल पल का हिसाब रखते चले खुद ही

September 21, 2010

हौसला भी कमाल की चीज़ है

हौसला भी कमाल की चीज़ है...
अंधेरों मे चिराग हो जाता है
पतझड़ मैं पराग हो जाता है
पराजय मे उम्मीद हो जाता है
गैरों का मुरीद हो जाता है
दंगो मे विश्वास हो जाता है
विरानो मे निवास हो जाता है
दोस्तों मे पैमाना हो जाता है
इश्क मे अफसाना हो जाता है
मंदिर मे भगवान हो जाता है
हादसों मे इंसान हो जाता है
... हौसला भी कमाल की चीज़ है

August 16, 2010

कल की शाम

महफिलों में गुजरी कल की शाम
बड़ी तनहा गुजरी कल की शाम

हंस के बोला कई हसीनों से मैं
तुझे बहुत ढूंडा कल की शाम

ये इश्क का खेल भी अजीब है
येही सोचता रहा कल की शाम

आशिकों का यूँही बड़ा नाम है
बेसुध कई मिले कल की शाम

अकेलापन रंग बदलता है
सुर्ख लाल था कल की शाम