January 17, 2018

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे मेहबूब न मांग [Translation]

Attempting a translation of Faiz Ahmed Faiz's iconic "मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे मेहबूब न मांग". You can read his original (transliterated in English) here.

Don't ask me to love as I used to, my love
I thought it was you who illuminated life
No sorrows of the world were greater than your sorrows
Your face gave the world its spring
Nothing worthy in this world, but for your eyes
If you were mine, fate would wither away
I wished it be so but it isn't that way
There are miseries, in these times, other than love
There are other pleasures to have beyond making love


Innumerable dreadful spells of centuries,
wrapped in satin and silk
Bodies put up for sale, everywhere, streets and markets,
battered in dust, bathed in blood


Bodies baked in diseased furnaces,
puss oozing from melting wounds
My gaze returns to those sights, what do I do,
but am still allured by your beauty, what do I do

There are miseries, in these times, other than love
There are other pleasures to have beyond making love
Don't ask me to love as I used to, my love
 

January 30, 2017

रह जाएगी

बिना रौशनी शाम अँधेरी रह जाएगी
बेसबब जिंदंगी गुज़रती रह जाएगी

पंखुड़ियों के बीच खुशबू को यूँ न छुपा
ऐ गुल तेरी हस्ती बेमानी रह जाएगी

अपना रुमाल ही गिरा दीजिये वरना
दिल से निकली बात अधूरी रह जाएगी

हसीं जलवों का कोई असर नहीं मुझ पर
अब ये मेरी बात पुरानी रह जाएगी

है रकीब वो मेरा पर आशिक़ भी तो है
उसे हराकर जीत बेमानी रह जाएगी

मेरी आग़ोश में रहोगे यूँही जब तक
हर लम्हे की उम्र बढ़ती रह जाएगी

उनके होठों का रंग ने पूछो मुझे से
गुलाबों की क्यारियां बेरंग रह जाएगी

January 25, 2017

रंग नया है

मौसम में निकले पत्तों का रंग नया है
डाल पर बैठी चिड़ियों का रंग नया है

बदन थकान से टूट रहा है मगर
आँखों पर उतरे जोश का रंग नया है

अफसरी हुक्म से शराब बंद है
प्यालों पर भरे पानी का रंग नया है

हम साथ रहते हैं पर बात नहीं करते
लबों पर हमारी ख़ामोशी का रंग नया है

ये घर अपनों की नज़दीकियां खोज रहा है
यहाँ पर फ़ैली दूरियों का रंग नया है

बच्ची की पायल से फर्श सुरमयी है
कालीन पर पड़ती ख़ुशी का रंग नया है

अच्छे दिन कुछ चल रहे हैं यूँ हमारे
कहने पर हर बात का रंग नया है

यूँ आधी रात को शेर कहने की तलब
ग़ज़ल पर चढ़ती नींद का रंग नया है

January 11, 2017

मैं घर से निकला

मैं घर से निकला
जाने कहाँ को निकला

मौसमी मर्ज़ समझा
दिल का रोग निकला

फूलों से हार निकले
गर्द से पेड़ निकला

कई हमदर्द निकले
बस एक दोस्त निकला

बारिश ने ज़ोर पकड़ा
चुनरी से रंग निकला

जिसे शिद्दत से चाहा
वही बे-वफ़ा निकला

जो था मंज़िल का निशां
वो नया रस्ता निकला

जिसे रकीब समझा
दिल का साफ़ निकला

ज़रा सा दम भर लूँ
फिर मैं भी निकला

भोपाली जाए कहाँ
ये अलग शहर निकला 

November 29, 2016

मुझे गले से लगाओ

देखने से नाशा नहीं होता, जाम होठों से लगाओ
मैं दोस्त पुराना हूँ तुम्हारा, मुझे गले से लगाओ

इसकी डोर पकडे रखो मगर, ज़रा ढील भी दो कभी
ज़िन्दगी की पतंग है, इस पर रंगीन कागज़ लगाओ

हवायें नहीं खोजती खुशबू की वजह, उसे फैलातीं हैं
किसी को मुस्कुराता देखो, वो हंसी होठों से लगाओ

खाक में ज़िन्दगी छुपी है, बारिश होने पर देखो
नामुम्किन लग रहे हैं जो, वो ख़्वाब आखों से लगाओ

आँखों के इशारों से, न खत औ' रोशनाई से बयां होगा
इज़हार-ए-मोहब्बत के लव्ज़ों को होठों से लगाओ

तेज़ हवाएँ जो चलीं तो पेड़ों से, फूल-पत्ते झाड़ गए
उन्हें उठाकर बनायें एक वेणी, तुम बालों से लगाओ

June 15, 2016

छोड़ जाते हैं

मोहब्बत के पंछी जिन पेड़ों को छोड़ जाते हैं
बहारों के मौसम उन रिश्तों को छोड़ जाते हैं


अनमोल हैं वो लम्हे जब रिश्तों के नाम नहीं होते
अकसर रिश्तों को नाम छोड़ जाते हैं


मौसम जो तालाब को कमल दे गए
वही रुके पानी में दुर्गंध छोड़ जाते हैं


गाँठ लग चुकी इस में ये पहले सा न रहा
इस रिश्ते को अब यहीं छोड़ जाते हैं


भोपाली को कोई और शहर रास नहीं आयेगा
उसका एक हिस्सा झील किनारे छोड़ जाते हैं

March 23, 2016

खिले फूलों को रोते हुए किसी ने न देखा

रंग और खुशबू से परे किसी ने न देखा
खिले फूलों को रोते हुए किसी ने न देखा

अपने आसपास की रौशनी में यूँ मगन
दूर के गहरे अँधेरे को किसी ने न देखा

मैंने कह दिया खरीदने निकला हूँ पूरा बाज़ार
मेरी जेब में चंद सिक्के हैं किसी ने न देखा

हमे ग़ुलाम-ए-हुस्न कहा तो क्या गलत कहा
उनकी नाफरमानी करते हमे किसी ने न देखा

आशिक़ की मज़ार पे शराबी रुक जाते हैं कभी
बड़े दिनों से उसे मयखाने में किसी ने न देखा

गैरों से उसे पूरा करने ही उम्मीद कैसे करूँ
जो मेरा ख़्वाब है वो और किसी ने न देखा

हम पिछले महीने की कहा-सुनी पर खफा हैं
वक़्त बरसों आगे बढ़ गया किसी ने न देखा